जो राहे ख़ुदा का निगहबान होगा
जहाँ में वही तो मुसलमान होगा
समंदर की लहरे थमी थी जहाँ पर
वहीँ से शुरू फिर से तूफ़ान होगा
हर इक का जो दर्द समेटे हुए हो
नहीं वोह कभी भी परेशान होगा
किया ज़िन्दगी को जो रब के हवाले
हर इक सांस फिर उसका मेहमान होगा
जो दीदार को उसके तड़पेगा 'साहिल'
वही उसके आँगन का मेहमान होगा
- शाहनवाज़ सिद्दीक़ी 'साहिल'
शमीम अंसारी भाई ने मेरी इस ग़ज़ल को बहुत ही बेहतरीन अंदाज़ में अपनी आवाज़ दी है, आप भी सुनिए!
जहाँ में वही तो मुसलमान होगा
समंदर की लहरे थमी थी जहाँ पर
वहीँ से शुरू फिर से तूफ़ान होगा
हर इक का जो दर्द समेटे हुए हो
नहीं वोह कभी भी परेशान होगा
किया ज़िन्दगी को जो रब के हवाले
हर इक सांस फिर उसका मेहमान होगा
जो दीदार को उसके तड़पेगा 'साहिल'
वही उसके आँगन का मेहमान होगा
- शाहनवाज़ सिद्दीक़ी 'साहिल'
शमीम अंसारी भाई ने मेरी इस ग़ज़ल को बहुत ही बेहतरीन अंदाज़ में अपनी आवाज़ दी है, आप भी सुनिए!
बेहतरीन!!
ReplyDeleteShukriya :)
Deleteबेहद ख़ूबसूरत:-)
ReplyDeleteशुक्रिया, नवाज़िश!
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