

हम पर तो अब तक गणेश जी के सबसे करीबी की हम पर नज़र नहीं पड़ी। वो भी पहुँच गए पहुंच गए बड़े लोगों के पास। आखिर मुझ जैसे फक्कड़ के घर में उन्हे खाने को क्या मिलता? अब बड़े लोगों की तो बात ही अलग है, बड़े लोग हैं तो उनके लिए खाना भी बड़ा अच्छा। हमारे यहां तो उन्हे बची हुई सूखी रोटी ही मिलती होगी और वह भी कभी-कभी, क्योंकि अक्सर तो वह हमें ही नहीं मिलती। हाँ उनके यहां अवश्य ही देसी घी के लड्डू मिल जाते होंगे। फिर वहां हिसाब रखने वाला भी कौन होगा कि लड्डू गायब कैसे हो गए, हमें तो पता रहता है कि हमने दो रोटी बनाई थी और उसमें से आधी बचा दी थी कि सुबह उठ कर खा लेंगे। परंतु जब सुबह वह रोटी नहीं मिलती है तो उसके लिए खोजबीन शुरू कर देते हैं। आखिर इतनी मुश्किल से रोटी कमाई जाती है। अब अखबार के लिखईया तो हैं नहीं कि डेली लेख अखबारों की शान बनें। ब्लॉग में ही तो लिखते हैं, कौन छापता है इसे अपने अखबार में? फिर यहां कोई एड-वैड भी नहीं मिलता। कभी-कभार हॉट लिस्ट में आ जाता है हमारा लेख, लेकिन अक्सर ही हमारे दुश्मन (हमसे जलने वाले दुसरे धुरंधर लेखक गण), हमारे लेख के छपते ही ताड़ लेतें हैं। और कहीं दूसरे ना पढ़ लें इसलिए धड़ा-धड़ नापंसद के चटके लगा देते हैं। बस फिर क्या लेख एग्रीगेटर से गायाब! बस यही कहानी है हमारी। कभी-कभार एक-आध कवि सम्मेलन में कोई बुला लेता है तो कुछ दान-दक्षिणा मिल जाती है, उसी से हम अपनी जीविका चला लेते हैं। भला हम जैसे फक्कड़ों के यहां क्यों कोई चूहां, मच्छर, छिपकली जैसे जंतु घूमेंगे?
अब जब खाते कम हैं तो पक्का है कि शरीर में खून भी कम ही होगा ना। बड़े लोगों की तरह थोड़े ही कि बदन में खून लबा-लब भरा रहे और महाशय अस्पताल में खून की कमीं के बहाने से मुफ्त में अपना ईलाज कराने के बहाने आराम करते रहें, चाहे अदालतें उनका कितना ही इंतज़ार करती रहे। और जब हमें कभी अस्पताल की ज़रूरत पड़ जाए तो जनरल बैड भी खाली नही मिल सकते। उसमें भी ले-दे कर काम चलाना पड़ता है।
खैर चूहा तो चूहा है, मनमौजी है! जब जी चाहेगा, जहाँ जी चाहेगा, वहीं जाएगा।
- शाहनवाज़ सिद्दीकी
(यह व्यंग्य "हरिभूमि" समाचार पत्र में दिनांक 12 जून 2010 को "चूहा तो महज़ प्राणी है" नमक शीर्षक के साथ छपा है.)
Keywords:
Mouse, Rate, चुहाँ, मुख्यमंत्री, Hindi critics
बहुत अच्छी पोस्ट..... एक पसंद का चटका भी दे दिया है.... मजबूरी है ...एक ही पसंद का चटका लगा सकते हैं.... otherwise...multiple voting detected... आ जाता है....
ReplyDeleteहमारे ब्लॉग पर आने और अपना कमेन्ट, साथ ही साथ वोट भी देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद महफूज़ भाई. आपका एक ही वोट काफी है, यह एक ही हज़ार वोटों के बराबर है. :)
ReplyDeleteबहुत अच्छा व्यंग है शाह जी! कमाल का लिखते हो. जय हो चूहें महाराज की, कभी हमारे घर भी पधारों!
ReplyDelete"अब अखबार के लिखईया तो हैं नहीं कि डेली लेख अखबारों की शान बनें। ब्लॉग में ही तो लिखते हैं, कौन छापता है इसे अपने अखबार में? फिर यहां कोई एड-वैड भी नहीं मिलता। कभी-कभार हॉट लिस्ट में आ जाता है हमारा लेख, लेकिन अक्सर ही हमारे दुश्मन (हमसे जलने वाले दुसरे धुरंधर लेखक गण), हमारे लेख के छपते ही ताड़ लेतें हैं। और कहीं दूसरे ना पढ़ लें इसलिए धड़ा-धड़ नापंसद के चटके लगा देते हैं। बस फिर क्या लेख एग्रीगेटर से गायाब! बस यही कहानी है हमारी"
ReplyDeleteNice Post. Very Gud.
ReplyDeleteचुहा तो महान प्राणी है। और आज कल तो इस प्राणी के महान अवतार ‘माउस’ के बिना कोई कम्यूटर भी नहीं चलता है। अगर चूहां ना होता, अररररर! मेंरा मतलब ‘माउस ना हो तो हम जैसे ब्लॉग छाप लिखइयों का कार्य कैसे चलता?
Ek or shandar post ke liye Mubarakbad shahnawaj ji. mera vote bhi aapke liye. bahoot shandar.
ReplyDeleteYeh to bahhut hi shandar likha hai - "हम डेली अपने पैर खुले छोड़ कर लेटते हैं, कभी-कभी तो चुहों के बिल में ही अपना पैर घुसा कर सोते हैं। और वहां बड़े लोग ऐसी रूम में मखमली बिस्तर पर और शानदार कम्बल में लिपट कर सोते हैं। इधर हम चूहें को खुली दावत देते हुए सोते हैं और उधर बड़े लोग उनके खिलाफ पूरा बंदोबस्त करके। फिर भी चूहें महाराज के द्वारा उन्हें ही एहमियत। मुझे तो इसमें किसी साजिश की बू आ रही है।"
ReplyDeletereally mujhe bhi sajish ki boo aarahi hai.
ReplyDelete:)
ReplyDeleteDhanywad Surinder ji, Rashmi aur Sanjeev ji. Apke comments aur sneh ka main abhari hun.
ReplyDeleteअच्छा व्यंग है शाह जी!
ReplyDeleteअच्छा व्यंग है शाह जी! + 1
ReplyDeleteye bahut achha likha hai
ReplyDeleteमालूम नहीं था की आप इस क्षेत्र के भी माहिर हैं.
ReplyDeletekya khoob likhi hai aapne ,hasya aur vyangya ki santulit maatra
ReplyDeleteAssalamu alaikum all.......
ReplyDeletewah mazaaaaaaaaa a gaya bhai....
bahut mast likha... ;)
chuhe Maharaj to mere ghar bhi nahi pae ja rahen hain..???
kahi sarkaar se tang aakar chuho ne hi to thikane lagane ki to nahi thani sabko???
akhir hum to ""AAM AADMI"" hai kuch kar hi nahi sakte,,,,
haath per haath dhare baithe rehte hain..
zyada hua to Blog per Aakar nikaal di apni Bhadaas..
ho sakta hai kuch kaam Ganesh ji ki Sawari hi kar de...
bahut badiya likha hai janab. bahut pasand aya mujhe.
ReplyDeleteमजेदार।
ReplyDelete:)
achha chintan he
ReplyDeleteBAHUT KHUB
BADHAI AAP KO IS KE LIYE
kya khub likha hai Shah JI........
ReplyDeleteखैर चूहा तो चूहा है, मनमौजी है! जब जी चाहेगा, जहाँ जी चाहेगा, वहीं जाएगा।
ReplyDeletebahut badiya likha hai janab.
Ji ha!! Shanu U R write. aaj kal aisa hi hota hai. Jisko Importance deni chahiye ussi ko nahi milti ........
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