औरंगज़ेब भी दूसरे राजाओं की तरह एक शासक ही था, जिसके अंदर बहुत सारी खूबियाँ थीं और ऐसे ही बहुत सारी कमियाँ भी थीं, पर उन खूबियों और कमियों का देश के मुसलमानों से कोई ताल्लुक़ नहीं है। भले ही उसने किताबें लिखकर और रस्सियां बुनकर अपना खर्च चलाने जैसा बेहतरीन काम होगा, पर सत्ता की लड़ाई में अपने सगे भाइयों की हत्या करने वाला, अपने भाई दारा शिकोह की हत्या के बाद उसके पार्थिव शरीर को शहर में घुमाकर नुमाइश करने वाला और उसके सिर को तश्तरी में सजाकर अपने पिता के सामने पेश करने वाले से हमारा सम्बन्ध तो हरगिज़ नहीं हो सकता है।
औरंगज़ेब सिर्फ एक शासक था
साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता की राजनीति और इसका नुक़सान
यह दोनों तरफ़ की पार्टियां चाहती हैं कि चुनाव सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता पर लड़ा जाए। क्योंकि इससे दोनों तरफ के लोगों को किसी एक पार्टी को वोट देना मजबूरी बन जाता है। फिर चुनाव में लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि उनके काम हुए या नहीं हुए, देश या राज्य तरक़्क़ी की राह पर जा रहा है या नहीं।
हालांकि कांग्रेस जैसी पार्टियां यह भूल जाती हैं कि जब नफरतें चरम पर होती हैं, तो फिर चाहे सेकुलर माइंडसेट वाले हिंदू हों या फिर मुसलमान, दोनों ही कम्युनल एजेंडे पर वोट देने को मजबूर हो जाते हैं और इनकी हार की यही वजह है!
देश के लोगों के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि चुनाव इमोशनल इशुज़ की जगह सिर्फ़ और सिर्फ़ जनता के कामों पर होने चाहिए। मतलब क्या काम किए, क्या नाकामी रही और आगे का क्या एजेंडा है, लोकतंत्र इसी का नाम है कि चुनाव के वक्त जनता अपने कामों के हिसाब से वोट दे!
साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के नाम से होने वाली राजनीति को हाशिए पर लाने का मेरी नज़र में सिर्फ यही एक हल है।
आप कारोबार में जितना ज़्यादा मेहनत करते हैं उतना ही कम कमाते हैं
इसलिए वक्त के साथ साथ बैलेंस बनाते हुए कारोबार में ख़ुद की मेहनत को कम करते जाइए और कारोबार चलाने और बढ़ाने के लिए ज़रूरी नेटवर्क को मज़बूत करते जाइए...
खुद अधिक मेहनत करने की जगह टीम बनाने उसे मैनेज करना सीखिए। मेरे एक मित्र का पारिवारिक कारोबार अच्छा चलता था, मैंने उसे समझाया कि आप लोग स्वयं मेहनत में लगे रहते हैं, इसकी जगह आपको काम करने वाले कारीगर लगाने चाहिए। इससे जो समय बचेगा उसे आप व्यसाय बढ़ाने में लगा सकते हैं। पर उसके पिता को यह बात समझ नहीं आई, उन्होंने कहा कि हम हाथ के कारीगर है फिर हम खुद काम करना छोड़कर दूसरों को इस काम पर क्यों लगाए? पर कुछ साल बाद उनका व्यवासय पिछड़ने लगा, क्योंकि उसके क्षेत्र में नए व्यवसायी आने लगे थे, जिन्होंने इन्वेस्टमेंट करके बड़ी फैक्ट्रियां लगाईं। काम बढ़ने के साथ-साथ उन्होंने ज़्यादा कारीगरों को हायर किया। जिससे वो कम्पटीशन में उनसे कम कीमत पर अच्छी क्वालिटी उपलब्ध कराने लगे। और इसका परिणाम यह हुआ कि धीरे धीरे उनका कारोबार ठप्प हो गया।
वैसे भी उसूल यह कहता है कि किसी कारोबार में रात-दिन मेहनत करके आप ज़िंदगी अच्छी तरह से चलाने का इंतजाम तो कर सकते हैं पर अमीर नहीं बन सकते हैं!
अमीर हालांकि अरबी का लफ्ज़ है, जिसका मतलब लीडर होता है, पर अगर पैसे वाले अमीर की बात की जाए तो वो वही व्यक्ति बनता है जो कारोबार को कम से कम मेहनत से मैनेज करना सीख लेता है। जब एक कारोबार कुछ चल जाए तो खर्च निकालने के बाद बचे मुनाफे से बाकी के कारोबारों की तरफ रुख करना ही अमीर बनने का सीधा रास्ता है। एक कमाई से कभी कोई अमीर नहीं बनता है!
और जो यह कहते कि अमीर गलत धंधे करके ही बनते हैं, वो आपको सिर्फ झूठ का सहारा लेकर बेवकूफ ही नहीं बना रहा होता है, बल्कि आपको डिमोटिवेट करके बहुत बड़ा गुनाह भी कर रहे होते हैं। याद रखिए कि पैसे कमाना शैतानी काम नहीं है बल्कि यह एक धार्मिक और समाज का भला करने वाला काम है, बशर्ते सही उसूलों से किया जाए!
इसलिए अमीर या फिर बिलिनियर बनने का लक्ष्य रखिए, खूब सारा पैसा कमाना बेहद ज़रूरी है और उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि ईश्वर जो हमें सामाजिक नेटवर्क के ज़रिए दे रहा है उसे समाज को वापिस भी किया जाए। यानी कौम, समाज, देश और इंसानियत के फायदे के लिए अपनी कमाई में से परिवार पर खर्च करने के बाद बचे पैसे का आधा हिस्सा खर्च किया जाए। यह पैसा आप शिक्षा, रिसर्च, भोजन, इलाज और लोगों को कारोबार कराने की व्यवस्था के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।
विश्वास कीजिए, आप जितना इंसानियत को फायदा पहुंचाने के लिए खर्च करेंगे आपका रब उसका कई गुना आपको वापिस करेगा। मतलब यह भी एक तरह से ईश्वर के साथ कारोबार हो गया... 😊
और वो बेहतरीन नफा देने वाला है!
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कोरोना मामलों में मीडिया का धार्मिक दुष्प्रचार
हजूर साहिब, महाराष्ट्र में फंसे ऐसे ही तीर्थयात्री जब पिछले हफ्ते पंजाब वापिस लौटे तो 148 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए। ऐसे ही कई और धार्मिक स्थलों में भी फंसे लोगों को निकालकर उनके शहरों में पहुंचाया गया है। कई धार्मिक/सामाजिक अनुष्ठानों में हज़ारों लोग इकट्ठा हुए। मध्य प्रदेश में अंतिम संस्कार में 1500 से ज़्यादा लोग जुटे, ऐसे ही महाराष्ट्र के एक मंदिर के कार्यक्रम में भी 1500 के करीब लोग इकट्ठे हुए, इन मामलों के कारण सैंकड़ों कोरोना पॉज़िटिव केस सामने आए।
हालाँकि ऐसे मामलों में लापरवाही की जाँच की जाती है और जो ज़िम्मेदार निकलेगा उन्हें सज़ा भी मिलनी चाहिए। पर मरकज़ निज़ामुद्दीन के बहुचर्चित मामले में मीडिया के दुष्प्रचार ने जिन मरीज़ों से सहानुभति होनी चाहिए थी, उन्हें अपराधी ठहरा दिया और मीडिया के इस घृणित व्यवहार पर देश में कहीं कोई चर्चा नहीं हुई!
जबकि मीडिया ने सरकार से कभीं सवाल नहीं किया कि जो लाखों लोग विदेशों से वापिस आए, उन्हें कोरोना टेस्ट किये बिना या फिर सरकारी क़वारन्टीन सेंटर्स में भेजने की जगह सीधे उनके घर क्यों जाने दिया गया? या फिर उनके घर को उसी समय रेड ज़ोन घोषित किया जाना चाहिए था। इस लापरवाही ने पूरे देश को लॉक डाउन की त्रासदी में धकेल दिया, तो फिर इसका ज़िम्मेदार कौन है? इसमें किसके खिलाफ केस होगा और किसे सज़ा मिलेगी?
मज़बूत लोकतंत्र और भारतीय संस्कृति का संगम विश्व को नई राह दिखा सकता है
गुजरात से आए कोरोना आंकड़ों ने चिंता बढ़ाई, कहीं दूसरे राज्यों में भी यही हाल ना हो!
चिंता की बात यह है कि गुजरात में रिकवरी रेट मात्र 6% के आसपास है, जबकि देश का औसत 19% है। गुजरात में 66% लोगों की मृत्यु पॉज़िटिव रिपोर्ट आने के 1 या 2 दिन के अंदर ही हो रही है।
मुझे लगता है कि इसके पीछे का मुख्य कारण कोरोना जाँच का बेहद कम होना है। मतलब कोरोना संक्रमण की जाँच मरीज़ के अंतिम स्टेज पर पहुंचकर ही हो पा रही है। मुझे आशंका है कि यह स्थिति कई और राज्यों में भी दिखाई दे सकती है। केंद्र सरकार को अभी से इसके लिए चेतना होगा और राज्यों को अधिक से अधिक टेस्टिंग किट उपलब्ध करानी पड़ेगी, वर्ना हालात बेकाबू होते देर नहीं लगेगी। हालांकि केंद्र सरकार यह दावा कर रही है कि अब बहुत ज़्यादा टेस्टिंग किट राज्यों को उपलब्ध करा रही है। दुआ करता हूँ कि यह दावा सही हो और लोगों की अधिक से अधिक जान बचाई जा सके।
हम सभी लोगों को सरकारों का साथ देना चाहिए, हमें लॉक डाउन का पालन सख्ती से करना पड़ेगा। एक बार में अगले 1-2 महीने का राशन लेकर रख लीजिए और उनका इस्तेमाल बेहद सावधानी से कीजिये। रोज़मर्रा की चीज़ें बाहर से लेना तुरंत बंद कर दीजिए, या फिर बहुत ज़्यादा एहतियात बरतिए।
जैसे कि दूध के पैकेट्स से दूध बर्तन में निकालकर फौरन ही पैकेट को सेफ जगह पर फेंककर तुरंत ही हाथों को अच्छी तरह से धोइये और उसके बाद ही किसी चीज़ को टच कीजिये। बाहर से रोज़-रोज़ ऐसी चीज़ों को लेना बंद कर दीजिये जिनके बिना काम चल सकता है।
जब तक यह बीमारी समाप्त नहीं हो जाती है, इलाज की व्यवस्था नहीं हो जाती है, तब तक बाहर निकलना बीमारी को दावत देना है। इसलिए लॉक डाउन का सख्ती से पालन कीजिये।
- शाहनवाज़ सिद्दीक़ी
अपने-पराए हर गलत को गलत कहिए
मरकज़ मैनेजमेंट की बड़ी गलती थी कि एडवाइज़री के बावजूद हज़ारों लोग जुटते रहे। हालांकि लॉक डाउन के बाद जो लोग फंस गए थे, उसमें भी और उससे पहले भी प्रशासन को लिखित जानकारी के बावजूद, रोज़ाना रिपोर्ट लेने के बावजूद अगर लोग आना-जाना कर रहे थे, तो इसमें प्रशासन की भी उतनी ही गलती थी। दरअसल लॉक डाउन से पहले तक प्रशासन स्वयं इतना गंभीर नहीं था।
22 तारीख तक शाहीन बाग जैसे धरने चलते रहे, मध्य प्रदेश में सरकार गिरती-बनती रही, संसद का सत्र चलता रहा, बड़े-बड़े लोगों की शादियों होती रही, अंतिम संस्कार जैसे कार्यक्रमों में हज़ारों लोग जुटते रहे। सभी बड़े मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों में भीड़ जुटती रही, कई जगह तो अभी भी भीड़ जुट रही है।
यह अवश्य है कि जमात से जुड़ा हर वह व्यक्ति व्यक्ति गुनहगार है, जिसने मेडिकल स्टॉफ अथवा प्रशासन के साथ दुर्व्यहार किया, जबकि मेडिकल स्टाफ और प्रशासन इस समय अपनी जान की परवाह किये बिना कोरोना को हारने की लड़ाई में लगे हुए हैं। हालाँकि उनके साथ प्रशासन के वो लोग भी ज़िम्मेदार हैं जो जमात से जुड़े बाकी लोगों से क़्वारन्टाइन में गुनहगारों जैसा व्यवहार कर रहे हैं, जिसके चलते दिल्ली के सुल्तान पूरी में बने क़्वारन्टाइन सेंटर में टाइम से दवाई और खाना नहीं मिलने के कारण शुगर पेशेंट 2 लोगों की मौत तक हो गई।
सलेक्टिव होकर दूसरों के किसी एक को या एक की वजह से हर एक जो दोष देने की जगह हर गलती को गलत कहिए और अगर अपनों को गलत नहीं कह सकते हैं तो आपको दूसरों पर बोलने का भी कोई अधिकार नहीं है।
मरकज़ भी एक मस्जिद ही है तो अगर मरकज़ में भीड़ जुटने को मैं गलत कह रहा हूँ तो आप बड़े-बड़े मंदिरों और गुरुद्वारों इत्यादि धार्मिक स्थलों में भीड़ जुटने का विरोध कीजिये और हम सब को मिलकर इन सभी धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक कार्यक्रम आयोजित करने वालों पर सख्त कार्यवाही की मांग करनी चाहिए, इनकी हठधर्मिता और स्वयं को सर्वोच्च समझने की सोच इंसानियत के लिए नुकसानदेह है।
भारतीय मुस्लिम्स को सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना होगा

जापान पर अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराए जाने और ज़मीन पर कब्ज़ा करने के बाद जापानियों ने कब्जा छुड़वाने के लिए कोशिशें करने की जगह शिक्षा का 20 वर्षीय मॉडल तैयार किया। और उसका परिणाम यह हुआ कि 1971 आते-आते जापान तकनीक में इतना आगे निकल गया कि अमेरिका को स्वयं ही जापान के शहरों से कब्ज़ा हटाना पड़ा।
दूसरी तरफ अगर मैं मुस्लिम समाज की बात करूं तो समाज की 80-90% आबादी आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है और हम आज भी अपने हालात पर फिक्र करने की जगह, पॉज़िटिव अप्रोच से प्लानिंग बनाने की जगह नेगेटिविटी पर जमे हुए हैं, दूसरों की कमिंयाँ ढूंढने में व्यस्त हैं। हमारे पास तो हालात को ठीक करने के काम में से चंद मिनट भी इन फालतू चीज़ों के लिए नहीं होने चाहिए थे।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने दलित और पिछड़े समाज के लिए काम किया, बल्कि असलियत यह भी है कि दलित और पिछड़े समाज ने भी उनका वैसे ही साथ दिया। अगर वो मुस्लिम समाज से होते तो हम में से अधिकतर तो उनके फ़िरक़े या फिर धार्मिक विचारों पर उंगली उठा रहे होते और बाकी बचे हुए लोग उन पर उठी हुई उंगलियों पर बहस कर रहे होते, उन पर विश्वास कर चुके होते। और ऐसा इसलिए है कि जब कोई किसी समाज के शिक्षित होने की कोशिश करता है तो समाज के ठेकेदारों को अपनी मठाधीशी खत्म होते हुए नज़र आती है और इसलिए वो ऐसे प्रयास में लगे लोगों के खिलाफ इमोशंस को भड़काकर धर्म विरोधी या फिर समाज विरोधी ठहराने की कोशिश करते हैं।
इसलिए किसी भी हालत में इमोशंस को भड़कने से बचाना है और किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले या फिर विरोध से पहले ठंडे दिमाग से सिक्के के हर पहलू को परखना ज़रूरी है।
आज अगर हम अपनी हालात सुधारना चाहते हैं तो उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों पर ध्यान देना होगा। अभी से रुट लेवल पर प्लान बनाकर इम्प्लीमेंट करने की शुरुआत करनी होगी।
- शाहनवाज़ सिद्दीक़ी